Deaddiction In Gorakhpur, Uttar Pradesh

Nasha Mukti Kendra In gorakhpur, Uttar Pradesh

Addiction Withdrawal Management In India

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संवेदना नशा उपचार केंद्र

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नशे का परिचय

  

नशीले पदार्थ क्या हैं?


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नशीले पदार्थ उन पदार्थों को कहते हैं जो सेवन के उपरांत व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक अवस्था को परिवर्तित करते हैं। इस प्रकार के अधिकतर पदार्थों का उपयोग शारीरिक और मानसिक चिकित्सा में किया जाता है। परंतु इस प्रकार के कई पदार्थ का उसके मानसिक प्रभाव के कारण चिकित्सकीय व्यवस्था के बाहर भी उपयोग किया जाता है। इनमें से अधिकतर पदार्थ ग़ैरक़ानूनी होते हैं। अपने मानसिक प्रभाव के कारण अर्थात् तंत्रिका तंत्र पर असर के कारण इन पदार्थों को मनोसक्रिय पदार्थ भी कहा जाता है। शराब,कैफ़िन (चाय – कॉफ़ी इत्यादि) तथा निकोटिन (तम्बाकू तथा उससे बनने वाले पदार्थ) पूरे विश्व में सबसे ज़्यादा उपयोग किए जाने वाले मनोसक्रिय पदार्थ हैं।

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सामान्यतया सबसे ज़्यादा उपयोग किए जाने वाले नशीले पदार्थ

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१. ऐम्फ़ेटमीन – यह उत्प्रेरक अर्थात तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करने वाला नशीला पदार्थ है।

२. अफ़ीम से बनने वाले दर्द निवारक।

३. नींद लाने वाली दवाईयाँ, जो तंत्रिका तंत्र की सक्रियता को कम (धीमा) करती हैं।

४. कैफ़िन, यह एक उत्प्रेरक प्रकार का नशीली पदार्थ है जो चाय कॉफ़ी और चोकोलेट इत्यादि में पाया जाता है।

५. कैनाबिस, यह एक प्रकार का विभ्रम पैदा करने वाला पदार्थ है जो तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली को भी धीमा कर देती है। इसमें गंजा, भांग तथा चरस जैसे पदार्थ शामिल हैं।

६. कोकीन, यह एक उजले रंग का पाउडर होता है जो तंत्रिका तंत्र को अति सक्रिय कर देता है।

७. अफ़ीम से बनने वाले नशीले पदार्थ जैसे, स्मैक, हेरोईन। Corex जैसी ख़ासी की दवाईयाँ भी इसी में शामिल हैं।

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नशे का इस्तेमाल कब एक समस्या बन जाती है?

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हानिकारक और नकारात्मक परिणाम तथा नशे पर से नियंत्रण का ख़त्म हो जाना यह संकेत करता है कि नशा एक समस्या का रूप धारण कर चुकी है।

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नशीले पदार्थों के दुरुपयोग की परिभाषा

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किसी भी ग़ैर क़ानूनी या डॉक्टर के पर्चे पर मिलने वाली दवाओं का नियमित रूप से एक साल या उससे अधिक समय से, उस दवा या नशीले पदार्थ का जीवन पर बुरे या नकारात्मक परिणाम के वाबजूद, सेवन जारी रखने को नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के रूप में परिभाषित किया जाता है।

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नशे के बुरे या नकारात्मक परिणामों की पहचान

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१. नशे के प्रभाव के दौरान चोटिल या दुर्घटना ग्रस्त होना।

२. दुशचिंता, चिड़चिड़ापन या अवसाद से ग्रसित होना।

३. स्पष्ट रूप से सोंचने में दिक़्क़त का होना।

४. नशे के दौरान किए गए कार्यों को भूल जाना।

५. रिश्तों के मध्य समस्या का उत्पन्न होना।

६. राशन, किराए तथा अन्य ज़रूरी पदार्थों पर ख़र्च रोककर नशे के सामानों पर ख़र्च करना।

७. नशे के इस्तेमाल या उसे रखने के कारण क़ानूनी पचड़े में फँसना।

८. उत्साहहीनता तथा ख़ालीपन महसूस होना।

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नशे की समस्या से ग्रसित होने के चरण

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१. प्रथम चरण या अवस्था: इसमें प्रायोगिक रूप से नशे का इस्तेमाल किया जाता है। समाज में विभिन्न अवसरों पर लोग नशे का इस्तेमाल करते हैं, जैसे, सप्ताहांत या छुट्टियों में, उत्सवों में या दोस्तों के साथ। इस अवस्था में कभी कभी व्यक्ति अकेले भी नशे का प्रयोग शुरू कर देता है।

२. द्वितीय चरण या अवस्था: इस अवस्था में व्यक्ति वास्तव में नशे का दुरुपयोग शुरू कर देता है। नशे का इस्तेमाल नियमित होने लगता है अर्थात् व्यक्ति सप्ताह में कई बार नशे का इस्तेमाल करने लगता है। वह नशे का इस्तेमाल कार्यावधि या दिन के समय भी प्रारम्भ कर देता है। वह इस चरण में दोस्तों के बीच के बजाय अकेले होने पर भी नशे का दुरुपयोग करने लगता है। अपने इस्तेमाल के लिए वह नशे की वस्तु की आपूर्ति को सुनिश्चित करता है। अर्थात नशा उसके ध्यान में आने वाला सबसे प्रमुख विचार होता है।

३. तीसरा चरण: इस अवस्था में व्यक्ति पूर्ण रूप से नशे की गिरफ़्त में आ जाता है। अर्थात उसे नशेड़ी के रूप में सम्बोधित किया जा सकता है। वह नशे का हर रोज़ नियमित रूप से इस्तेमाल करने लगता है। किसी भी क़ीमत पर वह नशे का इस्तेमाल करता ही है। इस दौरान वह कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार रहता है और कभी कभी आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल हो जाता है।

४. चौथा चरण (आशाहीनता की अवस्था): आशाहीनता की इस अवस्था में नशे की कितनी भी मात्रा का सेवन करने के वाबजूद उसे पहले की तरह आनंद की प्राप्ति नहीं होती है। वह सिर्फ़ नशे के सेवन को ना करने के कारण उत्पन्न होने वाले पीड़ादायक लक्षणों के भय से नशे का सेवन करने को बाध्य होता है। इस अवस्था में नशेड़ी व्यक्ति अपने जीवन या जीवन की आवश्यकताओं के लिए भी दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर हो जाता है। यहाँ तक कि व्यक्ति भोजन करने जैसा ज़रूरी काम भी परिवार के सदस्यों के दबाव में करता है। वह सामाजिक रूप से अकेला हो जाता है और उसकी संगति में सिर्फ़ वही लोग रहते हैं जो उसी की तरह नशे का सेवन करते हैं। ऐसी संगत का एकमात्र उद्देश्य नशे की आपूर्ति को सुनिश्चित करना होता है। नशेड़ी व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक समस्याएँ घेर लेती हैं, जो काफ़ी गम्भीर प्रकृति की होती हैं। वह व्यक्ति जो नशे की इस अवस्था में होता है, यदि उसे समय पर व्यावसायिक सहायता ना उपलब्ध कराई जाए तो उसकी मृत्यु सुनिश्चित हो जाती है। अर्थात समय से पहले ही व्यक्ति नशे के द्वारा अपनी हत्या कर जान दे देता है।

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किसी व्यक्ति को यह कैसे पता चलेगा कि वह नशे की समस्या से ग्रस्त हो चुका है?

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१. क्या आप नशे के बारे में अत्यधिक सोंचते हैं या आपके ध्यान का केंद्रबिंदु सिर्फ़ नशा ही होता है?

२. क्या आप नशे का सेवन बंद करने का या उसकी मात्रा कम करने का असफल प्रयास कर चुके हैं?

३. क्या आप महसूस करते हैं कि नशे के बिना आप काम नहीं कर सकते हैं या नशे के बिना आप जीवन का आनंद नहीं उठा पाते हैं?

४. क्या आपने कभी किसी दूसरे व्यक्ति से नाराज़ होकर या उससे ग़ुस्सा होकर नशे का सेवन किया है?

५. क्या आपने नशे के सामान का बिना उसे पूर्ण रूप से जाने या उसके प्रभाव को बिना जाने, सेवन किया है?

६. क्या आपने अपने नियमित इस्तेमाल के नशे के अभाव में किसी दूसरे नशे का सेवन किया है?

७. क्या आपने कार्य स्थल पर या विद्यालय में नशे के कारण लापरवाही की है?

८. क्या नशे की वस्तु का ख़त्म होने का विचार आपको भयाक्रांत कर देता है?

९. क्या आपने कभी नशे की वस्तु की या उसे ख़रीदने के लिए चोरी की है?

१०. क्या आप कभी नशे के इस्तेमाल के कारण गिरफ़्तार हुए हैं या कभी आपको इसके कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है?

११. क्या आपने कभी किसी समय नशे की वस्तु का बहुत अधिक मात्रा में सेवन किया है?

१२. क्या नशे का इस्तेमाल आपके दूसरे व्यक्तियों से रिश्ते पर ग़लत प्रभाव डालता है?

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उपरोक्त एक या एक से ज़्यादा सवालों का उत्तर यदि हाँ है तो आप नशे की समस्या से ग्रस्त व्यक्ति हैं।

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नशे के इस्तेमाल के सूचक

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१. कार्यस्थल या विद्यालय में उपस्थिति का कम होना।

२. मानसिक अवस्था में उतार चढ़ाव अर्थात् कभी बहुत अच्छा महसूस होना या कभी बहुत बुरा महसूस होना।

३. व्यक्तित्व में नकारात्मक परिवर्तन।

४. झूठ बोलना या ठगना।

५. दोस्तों की संगत का बदलना अर्थात् नशे के इस्तेमाल करने वाले दोस्तों की संगति में आ जाना।

६. अतिरिक्त गतिविधियों (रूचि के कामों में) हिस्सा ना लेना।

७. नशेड़ियों के जैसा पहनावा, ओढ़ावा हो जाना।

८. परिवार के सदस्यों के साथ दिन पर दिन टकराव बढ़ते जाना।

९. ज़्यादा विद्रोही स्वभाव का होना।

१०. वज़न गिरना तथा कई प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से ग्रसित होना।

११. ख़राब वेश–भुषा का होना।

१२. याददाश्त में कमी, पीछे की बातों को भूलना, शक्की स्वाभाव हो जाना।

१३. घर से अधिकतर समय ग़ायब रहना।

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नशे के मानसिक प्रभाव

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१. मानसिक अवस्था में बहुत तेज़ उतार–चढ़ाव होना, अवसाद, दुश्चिंता, शक का शिकार होना तथा स्वभाव का हिंसक होना।

२. रोज़ाना की ज़िंदगी से रूचि का ख़त्म हो जाना।

३. मानसिक रोगों की जटिलता का बढ़ना।

४. विभ्रम का होना (बिना स्रोत के सुनाई देना, दिखाई देना इत्यादि)।

५. असमंजस की स्थिति में होना।

६. नशे के मानसिक प्रभाव में कमी के कारण नशे की मात्रा को बढ़ाने की तीव्र लालसा होना।

७. जोखिम भरे व्यवहारों में संलिप्त होने की इच्छा होना।

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नशे के शारीरिक प्रभाव

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१. HIV तथा Hepatitis जैसे संक्रमण।

२. हृदय की गति में परिवर्तन या हरिद्याघात होना।

३. शवशन तंत्र के रोग होना।

४. पेट दर्द, उल्टी, क़ब्ज़, तथा पेट का ख़राब होना।

५. गुर्दे तथा यकृत का ख़राब होना।

६. दौरे का पड़ना तथा मस्तिष्क को नुक़सान पहुँचना।

७. भूख में परिवर्तन, शरीर के तापमान में परिवर्तन, सोने जागने के समय में परिवर्तन।

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नशे के सामाजिक प्रभाव

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१. विवाह पर।

२. घरेलू ज़िंदगी पर।

३. शिक्षा पर।

४. रोज़गार पर।

५. स्वास्थ्य और तंदूरस्ती पर।

६. व्यक्तित्व पर।

७. आर्थिक स्थिति पर।

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नशे की लत एक बीमारी है, इसका उपचार हो सकता है लेकिन यह ठीक नहीं हो सकता है।

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सह निर्भरता

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नशे के शुरुआती दौर में परिजन अपने स्तर पर नशे की समस्या से ग्रस्त व्यक्ति को नशामुक्त करने का असफल प्रयास करते हैं। इस प्रयास में नशे के आदि व्यक्ति को बाहर निकलने से रोका जाता है, उसके नशे की मात्रा को परिजन ख़ुद के प्रयास से कम करने का प्रयास करते हैं, उसे बड़े नशों के बजाय सिर्फ़ तम्बाकू का सेवन करने को कहा जाता है। परंतु बिना किसी व्यावसायिक उपागम के बिना ये सारे प्रयास असफल हो जाते हैं। यदि अभिभावक नशे के शुरुआती दौर में ही व्यावसायिक सहायता लेलें तो नशे की समस्या बहुत व्यापक और जटिल रूप धारण कर ही नहीं पाएगी।परिजनों का स्वयं के द्वारा किया गया यह असफल प्रयास व्यक्ति के नशे की समस्या की जटिलता को और बढ़ाता जाता है। परिजनों का यह गैरज़िम्मेदाराना रवैया सहनिर्भरता कहलाता है। बिना व्यावसायिक मदद के नशमुक्त हो पाना अत्यंत कठिन है।

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नशामुक्त कैसे हों?

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१. सबसे पहले व्यावसायिक मानसिक स्वास्थ्यकर्मी से मिलें (जैसे: मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलौजिस्ट, समाज कार्यकर्ता)।

२. उनकी सलाह के अनुसार डीटॉक्सिफ़िकेशन करवाएँ।

३. डीटॉक्सिफ़िकेशन के बाद नशे की समस्या से पीड़ित व्यक्ति को अपना जीवन सामान्य करने तथा पुनः नशे की चपेट में पड़ने से बचने के लिए मनोचिकित्सा और मनोवैज्ञानिक परामर्श की ज़रूरत होती है।



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 शराब की लत

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शराब की लत या दूसरे शब्दों में शराब पर निर्भरता एक बीमारी है, जिसके अग्र लिखित चार लक्षण हैं:-  

१. अत्यधिक तेज़ तलब: शराब पीने की अत्यधिक तेज़ इच्छा या ज़रूरत।  

२. मात्रा पर से नियंत्रण का हटना: व्यक्ति जब एक बार शराब पीना आरम्भ करता है तब वह अपने आपको शराब पीने से रोक नहीं पता है और शराब की मात्रा पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है।  

३. शराब पर शारीरिक निर्भरता: यदि शराब पीना बंद कर दिया जाए तो व्यक्ति में शराब छोड़ने के लक्षण उत्पन्न होते हैं, जैसे वामन की इच्छा होना, पसीना आना, शरीर में कम्पन होना, और व्याकुलता महसूस होना इत्यादि।  

४. शराब के लिए सहनशीलता उत्पन्न होना: जिस व्यक्ति को शराब की लत लग चुकी है उसे शराब पीने के प्रथम अनुभव को प्राप्त करने के लिए लगातार शराब शराब की मात्रा बढ़ानी पड़ती है।  

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शराबशारीरिक और मानसिक दोनो रूप से व्यक्ति के लिए व्यसनी है। इसके सेवन से व्यक्ति अपने आपको, अपनी दिनचर्या निभाने के लिए, शराब पर निर्भर पाता है। दूसरे शब्दों में बिना शराब के व्यक्ति अपनी दिनचर्या को नहीं निभा पाता है। इस कारण शराब का सेवन व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण या कभी कभी अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान ले लेता है।  

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शराबपर निर्भरता के स्तर के अनुसार, व्यक्ति जब शराब का सेवन एका एक बंद कर देता है तो उसमें शराब छोड़ने के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। ये लक्षण शारीरिक तथा मानसिक दोनो प्रकार के हो सकते हैं।  

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शराबछोड़ने पर उत्पन्न होने वाले शारीरिक लक्षण निम्नलिखित हैं:  

१. हाथ का काँपना  

२. पसीने का आना  

३. वमन की इच्छा होना  

४.दृश्य सम्बंधी विभ्रम होना (अर्थात ऐसी चीज़ों को देखना जो वास्तविकता में वहाँ मौजूद ही नहीं हैं।)  

६. अत्यधिक गम्भीर मामलों में मूर्च्छित हो जाना।  

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शराबछोड़ने पर उत्पन्न होने वाले मानसिक लक्षण निम्नलिखित हैं:  

१. अवसाद  

२. व्याकुलता  

३. अतिसम्वेदनशील और चिड़चिड़ा हो जाना  

४. अनिंद्रा या नींद आने में कठिनाई  

शराब पीकर ग़लत ढंग से व्यवहार करना 

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शराब पीकर ग़लत ढंग से व्यवहार करना शराब की लत से काफ़ी अलग है। इस मामले में व्यक्ति को न तो शराब की तेज़ तलब होती है, न ही शराब की मात्रा पर से नियंत्रण हटता है और न ही व्यक्ति में शराब पर शारीरिक निर्भरता के लक्षण उत्पन्न होते हैं। शराब पीकर ग़लत ढंग से व्यवहार करना शराब पीने के उस तरीक़े से परिभाषित होता है जिसमें व्यक्ति अग्रलिखित परिस्थितीयों में से एक या अधिक परिस्थितियों में पिछले १२ महीनों के दौरान पड़ चुका होता है:-  

१. महत्वपूर्ण कार्यों जैसे, ऑफ़िस का कार्य, स्कूल की पढ़ाई या घर की ज़िम्मेदारियों को निभाने में असफल हो जाता है।  

२. उन परिस्थितियों में भी शराब का सेवन करना जो स्वयं के लिए हानिकारक हों जैसे, गाड़ी चलाते समय या किसी मशीन पर कार्य करते समय।  

३. बार बार शराब के सेवन के कारण क़ानूनी पचड़े में फँसना, जैसे शराब पीकर गाड़ी चलाना या शराब के नशे में किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से क्षति पहुँचाना।  

४. शराब पीने के कारण रिश्तों का समस्याग्रस्त हो जाना या रिश्तों की समस्या का अत्यधिक बढ़ जाना और उसके बावजूद भी शराब का सेवन जारी रखना।  

शराब का हानिकारक व्यसन 

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यदि व्यक्ति विभिन्न प्रकार की ऐसी स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं से ग्रस्त है जिनका कारण सीधे शराब का सेवन है तो इसे शराब के हानिकारक व्यसन के रूप में परिभाषित किया जाता है।  

कुछ मामलों में ये स्वास्थ्य समस्यायें स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं, जैसे:  

१. अवसाद    

२. शराब के सेवन से सम्बंधित दुर्घटना जैसे सिर में चोट चपेट।  

३. अग्नाशय में सूजन हो जाना।  

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शराबके हानिकारक व्यसन के कारण कुछ स्वास्थ्य सम्बंधित ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जिनके लक्षण उस समय तक परिलक्षित नहीं होते हैं जब तक ये समस्याएँ एक ख़तरनाक अवस्था तक नहीं पहुँच जाती हैं।  ये समस्याएँ हैं:  

१. उच्च रक्तचाप  

२. यकृत का सिरोहसिस  

३. कुछ प्रकार के कैन्सर जैसे मुँह और आहार नाल (आँत) का कैन्सर 

 ४. हृदय का रोग  

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शराब के हानिकारक सेवन के कारण, इससे सम्बंधित कुछ सामाजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे अपने जीवन साथी के साथ सम्बन्धों में समस्या, परिवार के लोगों और मित्रों के साथ सम्बन्धों में समस्या, कार्यालय में सहकर्मियों तथा स्कूल में सहपाठियों के साथ सम्बन्धों में समस्या।  

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अत्यधिकमात्रा में शराब का सेवन

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कभी कभी व्यक्ति बहुत कम समय में अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन कर लेता है जिसका एक मात्र उद्देश्य शराब का बहुत ज़्यादा नशा उत्पन्न करना होता है, अर्थात कम समय में ही बहुत ज़्यादा नशा उत्पन्न करना। इस प्रकार अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न शराब का नशा अनेक तरीक़ों से घातक होता है।  

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तुरंत उत्पन्न होने वाले लक्षण:  

१. अत्यधिक शराब पीने के कारण तबियत ख़राब होना।  

२. सिर दर्द  

३. वामन की इच्छा  

४. शरीर में कम्पन  

५. वमन होना  

६. नशे के दौरान की बातों को भूल जाना। 

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इसके अलावा शराब की बहुत ज़्यादा मात्रा शरीर में होने के कारण व्यक्ति की जान भी जा सकती है।

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शराब के अत्यधिक नशे के कारण व्यक्ति ऐसे हानिकारक कार्यों में संलिप्त हो जाता है जो उसके लिए अत्यधिक हानिकारक होते हैं। ये हैं:  

१. कहीं गिर जाना  

२. दूसरे के विरुद्ध हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता  

३. वहाँ दुर्घटना  

४. असुरक्षित यौन सम्बन्ध  

५. शर्मिंदा होने वाले कार्यों में संलिप्तता  

६. क़ीमती वस्तुओं का खोना, सामान का क्षतिग्रस्त होना या मोबाइल फ़ोन खो जाना  

७. अत्यधिक नशे की अवस्था में अत्यधिक मात्रा में ख़र्च करना  

८. अपनी मेहनत की कमाई को गवाँ देना।

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दीर्घकालिक प्रभावों में शारीरिक तथा मानसिक निर्भरता का उत्पन्न होना तथा यकृत तथा मस्तिष्क को क्षति पहुँचना।  

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शराबके सेवन से उत्पन्न शारीरिक तथा मानसिक अनियमितताओं (विकारों) के लक्षण:  

१. शराब पीने को प्राथमिकता देने के कारण ज़रूरी ज़िम्मेदारियों को नहीं निभाना।  

२. ख़तरनाक तथा अनुचित परिस्थितियों में भी शराब का सेवन  

३. शराब के साथ अन्य दवाईयों का भी सेवन करना।  

४. शराब के सेवन के कारण क़ानूनी पचड़ों में फँसना  

५. तनाव को ख़त्म करने या रिलैक्स होने के लिए शराब का सेवन करना  

६. शराब के सेवन के लिए परिवार तथा मित्रों से अलग रहने लगना  

७. थोड़े समय के लिए भी शराब से दूर नहीं रहना  

८. वास्तविक व्यवहार से अलग व्यवहार करना  

९. अत्यधिक शारीरिक तथा मानसिक थकान  

१०. एकाएक गहरे अवसाद में चले जाना  

११. पाचन तंत्र में गड़वड़ी हो जाना  

१२. हृदय सम्बंधित विकार उत्पन्न हो जाना  

१३. यकृत सम्बंधित विकार उत्पन्न होना  

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शराब की लत के कारण  

१. व्यक्ति के शील गुण जैसे, निर्भरता, ग़ुस्सैल, अत्यधिक उत्साह, अवसाद तथा अंतर्मुखी स्वभाव इत्यादि।  

२. पारिवारिक प्रभाव जैसे, नशे की समस्या से ग्रस्त माता पिता या तलाकशुदा माता पिता  

३. आनुवंशिकता  

४. सामाजिक सांस्कृतिक दबाव  

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शराबकी लत में आसानी से पड़ने के कारण  

१. कुछ जातियों में सांस्कृतिक, सामाजिक या शारीरिक कारणों के कारण शराब की लत आसानी से लग जाती है।  

२. अन्य नशीले पदार्थों के सेवन करने वाले लोगों को भी शराब की लत आसानी से लग जाती है।  

३. आपदा जैसी परिस्थितियों जैसे: बेरोज़गारी, ख़ानाबदोश जैसी ज़िंदगी, मित्रों तथा रिश्तेदारों को खोना जैसे कारण शराब की लत लगने में सहायक होते हैं।  

४. आसानी तथा कम ख़र्च में शराब प्राप्त हो जाना तथा समाज में शराब को स्वीकृति प्राप्त होना भी इसकी लत में सहायक है।  

५. अत्यधिक ख़ाली समय का होना।

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क्या शराब की लत एक बीमारी है?  

हाँ, शराब की लत एक बीमारी है। शराब की तलब, भोजन तथा पानी की ज़रूरत जितनी तीव्र हो सकती है। एक शराब का व्यसनी व्यक्ति इस तथ्य के ववजूद कि इसके कारण पारिवारिक, स्वास्थ्य सम्बंधित तथा क़ानूनी मामले उत्पन्न हो रहे हैं, वह शराब का सेवन जारी रखता है। अन्य रोगों की तरह शराब की लत भी एक रोग है। यह जीवन के अंतिम समय तक व्यक्ति में पुनः उत्पन्न हो सकती है। यह रोग एक निश्चित रूप रेखा के अनुसार बढ़ती है तथा अन्य रोगों की तरह इसके भी लक्षण होते हैं। व्यक्ति आनुवंशिक तथा माहौल से सम्बंधित दोनो कारणों से इस रोग से ग्रस्त हो सकता है।  

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क्या शराब की लत बिलकुल ठीक हो जाती है?  

नहीं, अभी तक शराब की लत का कोई स्थायी उपचार नहीं है। यदि कोई व्यक्ति काफ़ी समय तक शराब के सेवन से दूर है, फिर भी वह पुनः शराब की लत से ग्रस्त हो सकता है। शराब की लत से बचने के लिए व्यक्ति को ऐल्कहाल से निर्मित किसी भी पेय से बचना चाहिए।

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क्या शराब की लत का कोई उपचार हो सकता है?  

हाँ, इसका उपचार सम्भव है। शराब की लत के उपचार के लिए परामर्श तथा दवाओं दोनो का प्रयोग किया जाता है। अधिकतर शराब के व्यसनी को शराब छोड़ने के लिए मदद की ज़रूरत होती है। उपचार तथा सहायता से अनेक शराब के व्यसनी व्यक्ति शराब से दूर रहने तथा सामान्य रूप से जीवन जीने में सक्षम हुए हैं।

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